अक्सर जब हम अपनी गाढ़ी कमाई को म्यूचुअल फंड में लगाने बैठते हैं, तो एक ही नाम वाले दो अलगअलग विकल्प स्क्रीन पर नजर आते हैं एक के आगे ‘डायरेक्ट’ लिखा होता है और दूसरे के आगे ‘रेगुलर’. बाहर से देखने पर दोनों जुड़वां भाई जैसे लगते हैं. दोनों का पोर्टफोलियो एक है, उसे संभालने वाला फंड मैनेजर एक है और निवेश की पूरी रणनीति भी बिल्कुल समान होती है. इसके बावजूद, इन दोनों के बीच एक बेहद बारीक लेकिन अहम अंतर है. यह ऐसा अंतर है जो लंबी अवधि में आपके बैंक खाते में आने वाले मुनाफे की तस्वीर को पूरी तरह बदल कर रख सकता है.

बिचौलिया या सीधा निवेश
इन दोनों विकल्पों के बीच का सबसे बुनियादी और बड़ा फर्क इस बात में छिपा है कि आप निवेश का रास्ता कौन सा चुनते हैं. जब आप ‘डायरेक्ट फंड’ का चुनाव करते हैं, तो आपका पैसा सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी यानी म्यूचुअल फंड हाउस के पास जाता है. इसमें बीच में कोई भी तीसरा व्यक्ति नहीं होता. दूसरी तरफ, ‘रेगुलर फंड’ में निवेश किसी एजेंट, डिस्ट्रीब्यूटर या वित्तीय सलाहकार के माध्यम से किया जाता है. निवेश की इस पूरी प्रक्रिया में यह डिस्ट्रीब्यूटर आपकी मदद करता है और यही बीच की कड़ी आपके निवेश की कुल लागत का गणित बदल देती है.
डायरेक्ट फंड में ज्यादा रिटर्न
अगर आप डायरेक्ट फंड के पिछले कुछ सालों के रिटर्न देखेंगे, तो वह हमेशा रेगुलर फंड के मुकाबले थोड़ा ज्यादा नजर आएगा. ऐसा इसलिए नहीं है कि डायरेक्ट फंड का मैनेजर कोई अलग रणनीति अपना रहा है, बल्कि इसका सीधा संबंध ‘एक्सपेंस रेशियो’ यानी फंड को चलाने के खर्च से है. डायरेक्ट प्लान में किसी भी एजेंट को कोई कमीशन नहीं देना पड़ता, जिससे इसकी लागत कम रहती है. यह मामूली सा अंतर शुरुआती दिनों में शायद आपको महसूस न हो, लेकिन जब आप कई सालों तक निवेश बनाए रखते हैं, तो यही छोटी सी बचत लाखों रुपये का अतिरिक्त मुनाफा बन जाती है.
रेगुलर फंड क्यों खरीदें?
यह सवाल उठना लाजमी है कि जब डायरेक्ट में ज्यादा पैसा बन रहा है, तो लोग रेगुलर फंड क्यों चुनते हैं? असल में, रेगुलर फंड के साथ आपको एक सपोर्ट सिस्टम मिलता है. शेयर बाजार कभी एक सीधी रेखा में नहीं चलता. जब बाजार में भारी गिरावट आती है, तो एक आम निवेशक का घबराना स्वाभाविक है. ऐसे वक्त में एक अनुभवी सलाहकार आपको जल्दबाजी में नुकसान बुक करने से रोकता है. वह आपके लक्ष्य के आधार पर सही फंड चुनने में मदद करता है. अगर आपको वित्तीय बाजार की ज्यादा समझ नहीं है, तो रेगुलर फंड में दी जाने वाली यह अतिरिक्त फीस असल में आपके निवेश की सुरक्षा फीस का काम करती है.
खुद का रिसर्च या एक्सपर्ट की सलाह?
फैसला पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह के निवेशक हैं. अगर आप खुद बाजार की रिसर्च कर सकते हैं, बुनियादी बातें समझते हैं और बाजार के उतारचढ़ाव देखकर घबराते नहीं हैं, तो डायरेक्ट फंड आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है. इससे आपकी लागत बचेगी और मुनाफा बढ़ेगा.
वहीं, अगर आप चाहते हैं कि कोई पेशेवर व्यक्ति आपके निवेश को सही दिशा में रखे, तो रेगुलर फंड का चुनाव करना समझदारी है. एक बात हमेशा याद रखें फंड को बारबार बदलना या बाजार गिरते ही पैसा निकाल लेना सबसे बड़ी गलती है. यह गलती आपको रेगुलर फंड की फीस से कहीं ज्यादा भारी पड़ सकती है. इसलिए, अपनी समझ के हिसाब से विकल्प चुनें और लंबी अवधि तक निवेश में टिके रहें.
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