मुगल सल्तनत दिल्ली के लालकिले तक सिमट चुकी थी. अंग्रेजों से मिली पेंशन सहारा थी. लेकिन बांदियां और चोबदार अभी थे. दरबार में बहादुरशाह जफ़र की आमद के पेशतर बांदी की आवाज गूंजतीहोशियार, अदब कायदा निगाहदार. फिर चोबदार इसे दोहराते. अमीरवज़ीरदरबारी सबकी गर्दनें निगाहें झुकी और हाथ बंधे रहते. बादशाह के गद्दी पर विराजते ही चोबदार पुकारता,”जिल्लेइलाही बरामद कर्द मुजरा अदब से. एक के बाद एक सहमे अमीरदरबारी तय जगह खड़े होते. तीन बार कोर्निश बजाते. बादशाह की शान में कुछ दोहराते. पढ़िए मुगल सल्तनत के आखिरी चिराग़ के दौर के कुछ किस्से.

राजपाट छिन चुका था. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था. बादशाह बहादुर शाह जफर मिजाज से सूफी थे. उन्हें पहुंचा हुआ पीर भी माना जाता था. तमाम शागिर्द थे. शायरी का बेपनाह शौक था. दरबार सजता था. करने और कहने को कुछ खास नहीं था. जाहिर है कि गुफ्तगू बादशाह के इर्दगिर्द सिमटी रहती. ख़्वाजा हसन निजामी को बादशाह के दौरदरबार के कई लोगों की आंखों देखेकानों सुने किस्से सुनने और दर्ज करने का मौका मिला.
निजामी के मुताबिक दरबार में बैठते ही बादशाह बयान करते कि उन्होंने आज एक ग़ज़ल लिखी है. इरशाद के स्वर गूंजते. फिर उनके पहले शेर के पढ़ते ही एक अमीर सहमासकुचाता अपनी जगह से उठता. सिर झुका कहता, “सुभानअल्ला कलामुल्मलूक मलूकुल्कलाम . फिर हर शेर पर दाद का ऐसे ही सिलसिला चलता रहता.
अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफ़र.
बादशाहत के रंगोंऐश से दूर जफ़र उस सूफ़ी इश्क़ में डूबे रहते थे, जो इंसान को ख़ुदा से मिलाने का भरोसा रखता था. यह सोच यकीन करती है कि ख़ुदा का मुकाम आसमान में नहीं बल्कि लोगों के दिलों में है. अपनी हस्ती को मिटा महबूब की हस्ती में मिलाने की जफ़र जैसे सूफ़ी शायर की ख्वाहिश उन्हें मजहब के कट्टर उसूलों से आजाद करती थी. जफ़र खुद को हिंदू प्रजा का रक्षक और कट्टर मुसलमानोंउलमा की ज्यादतियों का इलाज करने करने वाला बादशाह मानते थे. उनकी शायरी में हिंदू और मुस्लिम धर्म की एक ही रूह होने का जिक्र है. गंगाजमुनी तहजीब के कायल जफ़र के दरबार में हिंदूमुस्लिम एकता पर खासा जोर था.
बादशाह के साथ पीर भी
एक तो बादशाह और फिर पीर. कहा जाता कि उन पर ऊपर वाले की खास इनायत है. उनके मुरीदों की बड़ी तादाद थी. मुरीद बनते ही बादशाह की तरफ से हर महीने पांच रुपए मिलना तय हो जाता. इसकी वजह से भी बादशाह के मुरीद बनने की चाहत रखने वालों की लाइन लंबी रहती. छुटपन में बहादुरशाह को मौलाना फ़खर की गोद में डाला गया था. मौलाना के इंतकाल के बाद उनके बेटे मियां कुतुबुद्दीन से मजहबी मामलों में बहादुरशाह जफर ने बहुत कुछ सीखा. तीसरी पीढ़ी के मियां नसीरुद्दीन को तो बादशाह ने अपनी एक बेटी ब्याह दी थी.
साधुओंफकीरों की संगत बहादुर शाह जफर को खूब भाती थी. रूहानियत की दुनिया में बादशाह मसरूफ़ रहते. उस दौर के देहली उर्दू अखबार ने लिखा कि वे अपने जमाने के माने हुए पीर हैं, जिन पर खुदा की रहमत है. दरबार डायरी में दिल्ली की सूफी दरगाहों पर उनके जाने और मुजाबिरों के दरबार में आने पर उदारता से उन्हें नज़र देने का काफी जिक्र है. वे दरवेशों की तरह बेहद सादगी के साथ रहते थे. सादा जिंदगी गुजारते थे. उनका यह रहन सहन गद्दी पर बैठने के पहले जवानी के दिनों से ही चल रहा था. मेजर आर्चर ने 1828 में उनके बारे में लिखा था, ” वह दुबले पतले सादा शख्स हैं, जो बिल्कुल मामूली कपड़े पहनते हैं और गरीब मुंशी या टीचर जैसे लगते हैं.”
निर्वासित होने से पहले बहादुर शाह जफर लाल किले में ही रह रहे थे.
पेंशन से गुजर रही थी चैन की जिंदगी, बागियों ने किया बेबस
बेशक बादशाहत बाकी नहीं बची थी. लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलने वाली एक लाख महीने की पेंशन की बदौलत बूढ़े बादशाह आराम की जिंदगी गुजार रहे थे. पर 11 मई 1857 की तारीख ने उनकी जिंदगी में तूफान ला दिया. इस दिन मेरठ से अंग्रेजी सेना के बागी हिंदुस्तानी सिपाही इस उम्मीद में लाल किले में दाखिल हुए थे कि बादशाह सलामत उनका स्वागत करेंगे. वहां का मंजर उलट था.
कोई उम्मीद नजर न आने पर एक बागी सिपाही ने शाही ख़्वाजासरा महबूब अली खान के पेट में पिस्तौल सटा कर कहा, हमें अनाज दो. महबूब ने कहा जब हमारे पास कुछ है ही नहीं, तो हम कहां से दें? हकीम अहसनुल्लाह खां ने समर्थन करते हुए कहा,” बादशाह सलामत ने खुद ही कहा है कि हमारे पास पैसा नहीं है. वे खुद ही एक भिखारी की जिंदगी गुजार रहे हैं. हमारे पास अस्तबल के घोड़ों के लिए सिर्फ एक महीने का अनाज है. चाहे तो उसे ले लो. लेकिन उससे शायद तुम सबका एक ही दिन का काम चल सके ?”
बगावत की अगुवाई को नहीं थे तैयार
बागी सिपाही वापसी के लिए तैयार नहीं थे. उलटे तादाद बढ़ती गई . दीवानेखास के सामने इकट्ठा इन सिपाहियों के शोर के बीच बादशाह जफर बाहर आने को मजबूर हुए. सिपाहियों ने उनसे कहा कि वे अंग्रेजों को मारकर उनकी पनाह में आए हैं. “अगर आप हमारा साथ नहीं देंगे तो उस सूरत में अपने लिए जो कर सकते हैं वो करेंगे.”
दरबार में जो दृश्य कभी नहीं दिखे , वे दरपेश थे. बागी अड़े हुए थे. बादशाह कहते सुने गए, “एक बूढ़े आदमी के साथ इतनी बेइज्जती का सलूक क्यों किया जा रहा है ? हमारी जिंदगी का सूरज ढल रहा है.ये हमारे आखिरी दिन हैं. बस हम सुकून और तन्हाई चाहते हैं.” बादशाह ने अपनी मजबूरी बयान की,” न हमारे पास फौज है, न ही हथियार और न खजाना, हम किस तरह तुम्हारी मदद कर सकते हैं ?” बागी न सुनने को तैयार नहीं थे , ” हम लगान से आपका खजाना भर देंगे. हमे बस आपकी सरपरस्ती चाहिए.”
बूढ़े बादशाह ने मजबूरी में बगावत की कमान संभाली थी.
गद्दी पर आखिरी मुग़ल हूं!
बूढ़े बादशाह ने मजबूरी में बगावत की कमान संभाली थी. शुरुआती कामयाबी के बाद अंग्रेजों की ताकत के आगे बागी कमजोर साबित हुए. बादशाह नाउम्मीद हो चले थे. लाल किले से निकल वे दरगाह निजामुद्दीन पहुंचे. निराशा में डूबे हुए. चेहरा उतरा हुआ. दाढ़ी धूल से अटी हुई. गुलाम हसन चिश्ती को बादशाह के दरगाह में पहुंचने की खबर मिली. देखा कि बादशाह कब्र के सिरहाने दरवाजे से टिके बैठे हैं. चिश्ती ने खैरियत पूछी. उस उदास माहौल में भी वे हंसे और कहा, “मैंने पहले ही कहा था कि ये अभागे बागी सिपाही मनमानी कर रहे हैं. खुद भी डूबेंगे. मुझे भी डुबोएंगे. आखिर में वही हुआ. सब भाग निकले. मेरे बापदादों ने इससे भी मुश्किल वक्त देखा लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी. पर मुझे आने वाला कल दिख रहा है. कोई शक नहीं कि गद्दी पर आखिरी मुग़ल हूं. दिया बुझने को है. सैकड़ों बरस हमारा शासन चला. अब दूसरों का समय है. कोई बात नहीं. हमने भी तो दूसरों को मिटा अपना घर बसाया था.
निजामुद्दीन की दरगाह. फोटो: Getty Images
कितना बदनसीब है जफ़र?
बादशाह के पास एक छोटी सी संदूकची थी, जिसे उन्होंने गुलाम हसन चिश्ती को सौंपते हुए कहा, “अब यह तुम्हारे सुपुर्द है. तैमूर के कुस्तुनतुनिया जीतने पर यह बेशकीमती तोहफा हासिल हुआ था. इसमें पैगंबर हुजूर की दाढ़ी के पांच बाल हैं, जो हमारी नस्लों पर रहमत अता करते रहे हैं. अब मेरे पास जमींआस्मां कहीं ठिकाना नहीं. अब यह आपकी अमानत. बादशाह ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया था. चिश्ती से कहा कि घर में कुछ तैयार हो तो खिलाओ. घर में बेसन की रोटी थी. साथ के लिए सिरका मिला. वही थाल में आया. खाकर बादशाह ने पानी पिया.
शुक्रिया कहते हुए हुमायूं के मकबरे में शरण के लिए रवाना हुए. फिर वहीं से गिरफ्तारी हुई. जिस लाल किले से मुगलों की कई पीढ़ियों ने मुल्क पर हुकूमत की और जफ़र की तंगदस्ती के बीच भी जहां उनकी इजाज़त के बिना कोई नहीं बैठता था, वहां कैदी के तौर पर पेश हुए. मुकदमा चला. देश निकाला की सजा हुई. आखिरी वक्त रंगून की तन्हाई में ” कितना बदनसीब है जफ़र, दफ़न के लिये दो गज जमीं न मिली कू ए यार में , लिखते दुनिया से रुखसत हुएं
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